Tuesday, April 3, 2012

विनय मित्तल चाहें तो ख़त्म हो 
सकता है रेलवे के जनसंपर्क विभाग 
के साथ हो रहा सौतेला व्यवहार

भारतीय रेलवे एकल प्रबंधन के अंतर्गत विश्व का दूसरा और एशिया का सबसे बड़ा संगठन है. पब्लिक इंटरप्राइजेज का इससे बड़ा उदहारण पूरे भारत में और कोई नहीं है. रोजाना 2 करोड़ से ज्यादा यात्रियों और लगभग 1.50 करोड़ टन माल भारतीय रेलवे अपने लगभग 66000 रूट किलोमीटर पर स्थित 8500 स्टेशनों के माध्यम से प्रतिदिन परिवहन करती है. पूरे भारत के यात्रियों की सेवा करने वाले इस विशाल जन संगठन में जनसंपर्क का कार्य करने वालों के कैरियर की स्थिति बहुत ख़राब है. कहा तो यह भी जाने लगा है कि अगर किसी से सात जन्मों की पुरानी दुश्मनी निकालनी हो तो उसे रेलवे के जनसम्पर्क विभाग में ज्वाइन करने का मशवरा दे दो. कुछ ही दिन में न तो वह जीने के लायक रह जाएगा और न मरने के.. केंद्र सरकारके विभिन्न विभागों में भारतीय रेलवे ही एक ऐसा संगठन रहा है जिसने 1950 में ही जनसंपर्क के महत्व को समझ लिया था और उसी समय से रेलवे में जनसंपर्क विभाग की स्थापना की गयी थी. परन्तु यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज 63 वर्षों के बाद भी इस विभाग को मुख्य धारा में नहीं लाया जा सका है. इस विभाग में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों की स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है. न तो इनके पदों की संख्यां बढाई गई है, और न ही प्रमोशन के अवसर बढ़ाये गए हैं. लोग वर्षों से एक ही पद पर काम करते हुए हताश और निराश हो रहे हैं. अब तो मुख्य जनसंपर्क अधिकारियों के पद पर दूसरे विभागों के अधिकारियों को लाकर ऊपर बैठाया जाने लगा है. 


पिछले 63 वर्षों में रेलवे का आकार बहुत बढ़ गया, यात्रियों की संख्या कई गुना बढ़ गयी, नए - नए जिला स्तर पर नए - नए और हजारों की संख्या में समाचार पत्र खुल गए, नए - नए सेटेलाईट चैनल्स आ गए, केबल चेनल्स खुल गए, तमाम समाचार एजेंसियां खुल गईं. मास मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया के नए - नए श्रोत आ गए. परन्तु रेलवे का जनसंपर्क  विभाग जस का तस ही है. जबकि जनसंपर्क विभाग का काम कई गुना ज्यादा बढ़ गया. इस विभाग पर इतना दबाब बढ़ चुका है कि अगर समय रहते इस विभाग को दुरस्त नहीं किया गया तो स्थिति बहुत ख़राब हो सकती है. एक तरफ रेलवे का विस्तार और दूसरी तरफ मीडिया का बढ़ता दबाव, दोनों तरफ से दवाब ही दबाव है. उस पर से कोई प्रमोशन नहीं, ऐसी स्थिति में इतना ज्यादा तनाव इस विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों पर है कि उसे व्यक्त कर पाना भी इनके लिए असंभव होता जा रहा है. पदों के वितरण में जैसा मजाक इस डिपार्टमेंट के अलावा शायद ही किसी अन्य डिपार्टमेंट में किया गया है. पूरे भारत में किसी अन्य विभाग के साथ शायद ही ऐसा किया गया होगा. सामान्यतया पदों की जो रूपरेखा बनाई जाती है उसमे सबसे पहले नीचे वाले पदों की संख्या ज्यादा रहती है एवं उसके ऊपर कम तथा उसके ऊपर और कम. परन्तु रेलवे के इस जनसंपर्क विभाग में एक विचित्र तरीके से पदों का वितरण किया गया है, जिसे समझ पाना अच्छे - अच्छे लोगों के वश की बात नहीं है. 


इस विभाग में नियमित तौर पर पूरी भारतीय रेल में जनसंपर्क अधिकारियों (पीआरओ) के सिर्फ 50 पद हैं, जबकि सीनियर पीआरओ के मात्र 3 पद ही हैं, इसमें भी रेलवे बोर्ड कभी 3 बताता है तो कभी 5, और उसके ऊपर जेएजी यानि मुख्य जनसंपर्क अधिकारी (सीपीआरओ) में 11 पद बताए जाते हैं. इसका मतलब यह है कि जब पीआरओ और सीनियर पीआरओ  ही नहीं बन पाएँगे, तो उसके आगे जाना तो इनके लिए संभव ही नहीं है, क्योंकि वह रेगुलर बेसिस पर प्रमोटेड नहीं हैं. इस तरह पदों का वितरण किस आधार पर किया गया है, यह तो किसी की भी समझ से परे है. इसका नतीजा यह है कि पीआरओ के पद पर यहाँ एक - एक अधिकारी 16-18 सालों से काम कर रहा है. अगर किसी को सीनियर पीआरओ में पोस्ट भी किया गया है तो वह तदर्थ (एडहाक) आधार पर किया गया है, जिससे कि आगे उसे कोई प्रमोशन मिलने में कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है. 


एक बहुत बड़ी विडम्बना यह भी है कि जहाँ दूसरे सभी विभागों में पदों का अपग्रेडेशन किया गया है, वहीं इतने सालों के बाद भी इस विभाग की तरफ किसी ने झांक कर देखने की भी ज़रुरत नहीं समझी. इसका परिणाम यह हुआ है कि इस डिपार्टमेंट के लोगों को प्रमोशन रेगुलर आधार पर नहीं मिला, जबकि दूसरे विभागों के अधिकारी यहाँ आकार यहाँ की पोस्टों पर शान से विराजमान हैं. एक और हास्यास्पद बात यह है कि रेलवे में पब्लिसिटी इंस्पेक्टर के पद के लिए तो पत्रकारिता की डिग्री होना ज़रूरी है, लेकिन उसी विभाग का मुखिया अर्थात मुख्य जनसंपर्क अधिकारी बनने के लिए यह कोई ज़रूरी शर्त नहीं है. आज के दौर में जहाँ हर डिपार्टमेंट में, वहां का चाहे छोटा कर्मचारी हो या बड़ा अधिकारी, सभी के लिए प्रोफेशनल डिग्री ज़रूरी है, वहां इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है? कितने सारे मंत्री आये और चले गए, सभी को मीडिया में बढ़िया पब्लिसिटी चाहिए, उनका बड़ा - बड़ा फोटो छपना चाहिए, रेलवे में चल रहे कार्यों के बारे में भरपूर प्रचार चाहिए, जो यह विभाग बखूबी करता आरहा है, लेकिन इस विभाग के लोगों की क्या समस्या है, किसी ने एक बार भी अब तक इस पर विचार नहीं किया. स्व. माधव राव सिंधिया एकमात्र ऐसे रेल मंत्री थे जिन्होंने भारतीय रेल में न सिर्फ जनसंपर्क विभाग के महत्व को समझा था, बल्कि यहाँ के नए कर्मचारियों के लिए कुछ नए पद भी बनाए थे, लेकिन उनके पश्चात किसी भी रेल मंत्री ने न तो कर्मचारियों और न ही अधिकारियों के नए पद बनाये, न  ही इस विभाग को मजबूती प्रदान करने की कोई कोशिश की. वहीँ दूसरी ओर केंद्रीय मत्रालयों एवं सार्वजनिक उपक्रमो में जनसंपर्क विभाग के पद अब महाप्रबंधक स्तर तक पहुँच गए हैं और उसमे सिर्फ जनसंपर्क विभाग के लोग ही पदस्थ हो सकते हैं, दूसरे विभागों के नहीं ! 


एक और बहुत बड़ी समस्या यह है कि वर्तमान में अधिकतर जनसंपर्क अधिकारियों की औसत आयु लगभग 40-45 वर्ष है और वह अबतक लगभग 15 वर्षों की गजटेड सर्विस जूनियर स्केल में पूरी कर चुके हैं. तथापि अभी भी वे जूनियर स्केल में ही हैं, जबकि यहीं अन्य विभागों के अधिकारी जेएजी में पहुँच चुकें हैं. ऐसी स्थिति में वह अपनी आगे की 15-20 साल की बाकी सर्विस आगे बिना किसी प्रोन्नति के किस तरह कर पाएँगे? यह एक अत्यंत चिंताजनक विषय है, क्योंकि उनको अपने सामने अपना कोई भविष्य दिखाई नहीं दे रहा है. इस गंभीर समस्या को प्रमोटी आफिसर्स फेडरेशन के सामने भी कई बार उठाया गया, लेकिन फेडरेशन की तरफ से भी हर बार सिर्फ हवा में ही बातें की जाती रही हैं. एक सुझाव यह भी दिया गया था कि चूँकि जनसंपर्क विभाग का कार्य ट्रैफिक डिपार्टमेंट से, खासतौर पर वाणिज्य विभाग से, ज्यादा सम्बंधित है, इसलिए इसे ट्रैफिक डिपार्टमेंट के साथ 'इंटर से सीनियारिटी' देकर समाहित कर दिया जाये, लेकिन वहां भी नतीजा अब तक शून्य ही रहा है. 


पिछले कुछ वर्षों से रेलवे बोर्ड द्वारा रेलवे की अच्छी छवि बनाने (इमेज बिल्डिंग) पर अत्यंत जोर दिया जा रहा है, जिससे जनसंपर्क विभाग का काम बहुत ज्यादा बढ़ गया है. इस काम को इन सारी समस्याओं के बावजूद इस विभाग द्वारा बखूबी अंजाम दिया जा रहा है. अन्य केंद्रीय मंत्रालयों का आंकलन किया जाये, तो यह स्पष्ट होता है कि हर प्रकार की मीडिया में रेलवे की ख़बरों को सबसे ज्यादा प्रमुखता मिलती है, चाहे वो अच्छी हो या ख़राब, अगर अच्छा काम होगा तो खबरें अच्छी ज़रूर छपेंगी और अगर काम ख़राब होगा, तो उसे कोई भी आज के इस संचार और मीडिया के युग में जबरदस्ती अच्छा नहीं बना सकता. श्री विनय मित्तल, अध्यक्ष, रेलवे बोर्ड, का इस समय रेलवे की इमेज  बिल्डिंग पर काफी जोर है और वे स्वयं इस विषय पर काफी रूचि लेते हैं, उनका कार्यकाल भी काफी लम्बा है, अगर वह चाहें तो इस विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए बहुत कुछ कर सकते हैं, जिससे कि न सिर्फ इस विभाग के साथ वर्षों से चली आ रही सौतेले व्यवहार की यह समस्या दूर हो सकती है, बल्कि रेलवे का यह जनसंपर्क विभाग और भी सशक्त हो सकता है. जब समस्या रेलवे जैसे कल्याणकारी संगठन की साफ - सुथरी छवि पूरे देश और करोड़ों रेलयात्रियों के सामने रखने वालों की हो, तो थोड़ा सा अधिकार तो उनका भी बनता है, अगर इसे दिमाग के साथ - साथ दिल से भी सुलझाने की कोशिश और थोड़ी सी पहल बिना भेद - भाव के की जाये, तो यह समस्या इतनी भी बड़ी नहीं है कि श्री विनय मित्तल इसे सुलझा नहीं सकते..! 

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उत्साहविहीन वातावरण 
आजकल भारतीय रेल में रेलवे बोर्ड से लेकर जोनल और मंडल  मुख्यालयों तक सभी रेलकर्मियों और अधिकारियों में मुर्दनी सी छाई हुई है. भारतीय रेल में चारों तरफ एक उत्साहविहीन वातावरण पसरा हुआ है. इसका सबसे बड़ा कारण यह बताया जा रहा है कि नए मंत्री का आना किसी को पसंद नहीं आया है, क्योंकि नए मंत्री की छवि साफ-सुथरी नहीं है. इससे सभी अधिकारी और कर्मचारी डरे हुए हैं. बताते हैं कि पूर्व रेलवे में हालत और भी ज्यादा ख़राब है, क्योंकि वहां के लोग अब तक जिस आदमी को बतौर एक स्क्रेप डीलर जानते थे जो कि अपने बिल पास कराने के लिए क्लर्क से लेकर कार्यालय अधीक्षक की टेबल्स के चक्कर लगाया करता था, उसे अब वह मंत्री के रूप में देखकर हैरान और थोड़ा सा परेशान हैं. उन्हें इस आदमी के हाथों में भारतीय रेल का भविष्य सुरक्षित नजर नहीं आ रहा है और वे आपस में यह भी कहते सुने जा रहे हैं कि यह आदमी भारतीय रेल को स्क्रेप में बेच डालेगा. रेलवे बोर्ड में पिछले हफ्ते जो हुआ उससे तो यही संकेत मिल रहा है. 
बताते हैं कि पिछले हफ्ते मंत्री ने डीआरएम की वैकेंसी वाली फाइल लेकर सीआरबी को अपने चेंबर में बुलाया था. सीआरबी ने उन्हें बताया कि दिसंबर 2011 से 10 डीआरएम की वैकेंसी चल रही हैं. प्राप्त जानकारी के अनुसार इस पर मंत्री ने अपनी जेब से एक कागज़ का टुकड़ा निकाला जिसमे करीब 7 - 8 लोगों के नाम थे, उन्होंने सीआरबी से कहा कि 'इन लोगों' का नाम जोड़कर ले आओ, इन्हें डीआरएम बनाना है. इस पर सीआरबी ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि ऐसा नहीं होता है, पहले वरिष्ठता के आधार पर लिस्ट बनती है, फिर उनका पैनल बनाकर उनका विजिलेंस क्लियरेंस लिया जाता है. उसके बाद उनकी क्रमशः पोस्टिंग की जाती है. इस पर मंत्री ने सीआरबी से कहा कि फिर हम और आप यहाँ किस लिए बैठे हैं.. जाओ इनका नाम लिस्ट में जोड़कर फाइल लाओ तभी फाइल पर हस्ताक्षर होंगे..! इसके बाद सीआरबी फाइल लेकर चुपचाप वापस चले गए. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वह इस बारहवीं पढ़े मंत्री को कैसे समझाएं? 
इससे एक बात तो तय हो गई है कि इस मंत्री के साथ बोर्ड अधिकारियों को काम करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. बताते हैं कि सीआरबी भी खुद को काफी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. इसके साथ ही कुछ बोर्ड मेम्बरों को छोड़कर बाकी बोर्ड मेम्बर भी अनिश्चित हैं. मगर सेक्रेटरी रेलवे बोर्ड की मुराद पूरी हो गई है क्योंकि उन्हें उत्तर रेलवे का महाप्रबंधक बनाने का प्रस्ताव मंत्री ने पास कर दिया है. जबकि सभी फेडरेशन हताश हैं, क्योंकि बढ़ा हुआ रेल किराया नए मंत्री ने वापस ले लिया है. मगर जैसी कि उनकी मांग थी केंद्र सरकार से इसकी भरपाई किए जाने का कोई आश्वासन नहीं मिला है. रेल अधिकारियों और कर्मचारियों में उत्साहविहीनता का यह भी एक बड़ा कारण बताया जा रहा है. नए मंत्री भी कोलकाता से ही रेलवे का काम-काज चला रहे हैं और अपनी पार्टी सुप्रीमो की पूंछ पकड़कर ही चल रहे हैं. इसके अलावा हर ट्रांसफ़र, पोस्टिंग और प्रमोशन में सौदेबाजी शुरू हो गई है. बोर्ड के कुछ अधिकारियों का तो यहाँ तक कहना है कि यह तो जाफर शरीफ से ज्यादा गया गुजरा वक्त आ गया है. जे. के. साहा के बोर्ड में वापस आ जाने से चोर-चोर मौसेरे भाईयों वाली कहावत यहाँ चरितार्थ होने जा रही है. 
रेलवे में करीब 2.25 पद खाली पड़े हुए हैं. इनमे से लगभग 1.25 लाख पद सिर्फ संरक्षा कोटि के हैं. हर बजट में नई - नई गाड़ियाँ चलाने की घोषणा कर दी जाती है, मगर इनके लिए अतिरिक्त मैन पावर की पहले से कोई व्यवस्था नहीं की जाती है. आरआरसी की जो विभागीय भर्ती प्रक्रिया चल रही है, वह अत्यंत धीमी है. उसमे भी भ्रष्टाचार घुसा हुआ है. जिससे समयानुसार इसका फायदा नहीं मिल पा रहा है. अधिकारी और कर्मचारीगण इतने हताश और निराश हो रहे हैं कि उनमे काम करने की इच्छाशक्ति ही लगभग ख़त्म हो गई है. अधिकारी से लेकर सीनियर सबार्डिनेट स्तर तक के कर्मचारी या तो स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) लेकर कहीं निजी संस्थानों में अपनी जुगाड़ लगा रहे हैं, या फिर यहाँ सिर्फ अपना टाइम पास कर रहे हैं. इस निराशाजनक माहौल में भारतीय रेल का भविष्य भी अत्यंत निराशाजनक दिखाई दे रहा है. इस निराशाजनक माहौल में अधिकारी और कर्मचारीगण अपने फेडरेशनो की तरफ देख रहे हैं कि अब वही कोई कड़ा कदम उठाएं जिसमे वे उनका पूरा साथ देने का मन बना चके हैं. इस लिए आने वाले समय में सभी फेडरेशनो से एकजुट होकर भारतीय रेल को बचाने की उम्मीद की जा रही है. 
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Sunday, April 1, 2012


26 अप्रैल को नहीं अब 9 मई को होगा सेमिनार 


"भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन"


(RESURRECTION OF INDIAN RAILWAYS - AN INTROSPECTION)


किन्हीं अपरिहार्य कारणों की वजह से उपरोक्त विषय पर 26 अप्रैल को आयोजित होने वाले सेमिनार की तारीख को थोडा सा आगे बढ़ाया जा रहा है. अब यह सेमिनार 9 मई को होगा. सेमिनार का स्थान नहीं बदला है, यह वाय. बी. चव्हाण प्रतिष्ठान सभागृह में ही होगा. एक लम्बे अंतराल के बाद 'परिपूर्ण  रेलवे समाचार' द्वारा पिछले कई सालों से चली आ रही अपनी परंपरा का निर्वाह करते हुए इस बार एक नए और समसामयिक विषय पर राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है. 

इस महत्वपूर्ण और समसामयिक सेमिनार में भारतीय रेल के पांचो मान्यताप्राप्त फेडरेशनों के उच्च पदाधिकारियों सहित रेलवे बोर्ड के सभी सदस्यों और जोनल रेलों के महाप्रबंधकों को भी आमंत्रित किया गया है. इसके अलावा बाहर से भी कुछ रेल विशेषज्ञों को इसमें शामिल होने हेतु बुलाया गया है. 

यह सेमिनार वाई. बी. चव्हाण प्रतिष्ठान सभागृह, जनरल जगन्नाथ भोसले मार्ग, मंत्रालय के पास, नरीमन पॉइंट, मुंबई - 21 में 26 अप्रैल को नहीं अब 9 मई को  आयोजित किया जाएगा. 

इस बार ऐसे समसामयिक विषय को लेकर 'रेलवे समाचार' द्वारा सेमिनार का आयोजन किया जा रहा, जिससे करीब 160 साल पुरानी इस महान संस्था के 'पुनरुत्थान' के बारे में एक सार्थक चर्चा की जा सके. इसीलिए इस बार का विषय "भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन"  रखा गया है. सेमिनार में बड़ी संख्या में रेलकर्मियों और यात्रियों एवं यात्री संगठनों से भाग लेने की अपील की जाती है. 


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