Saturday, March 17, 2012


'ममता' के मोह को त्यागो सरदार जी..! 

रेल बजट के तुरंत बाद केंद्र की सत्ता में भागीदार तृणमूल कांग्रेस और उसकी अध्यक्ष पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जिस तरह हमेशा की भांति अपनी घटिया तुनकमिजाजी दिखाते हुए सरकार को ब्लैकमेल करने की कोशिश की है, उसे अब कतई बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए. केंद्र सरकार को चाहिए कि वह अब ममता बनर्जी के प्रति अपनी 'ममता' का फ़ौरन त्याग करे. ममता बनर्जी चाहती हैं कि एक साफ-सुथरी छवि वाले रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी को हटाकर एक ख़राब छवि वाले मुकुल राय को रेलमंत्री बना दिया जाए. कोलकाता की लिलुआ और कचारापारा रेलवे वर्कशाप से स्क्रेप की 'खरीदारी' कर-करके कथित राजनेता बन गए किसी व्यक्ति को यदि रेल महकमा थमा दिया गया तो यह निश्चित मान लिया जाना चाहिए कि वह व्यक्ति पूरी रेल को स्क्रेप में बेच डालने में कोई कोताही नहीं करेगा. इसके अलावा रेलवे के ही किसी स्क्रेप 'खरीदार', यहाँ 'खरीदार' का सन्दर्भ 'चोर' से लिया जाना चाहिए, क्योंकि कोई भी स्क्रेप खरीदार चोरी करने से कभी बाज नहीं आता है, को रेलमंत्री के रूप में यह देश कतई बर्दास्त नहीं करेगा. इसके साथ ही रेलवे के करीब 14 लाख रेलकर्मचारी और अधिकारी भी मुकुल राय को रेलमंत्री के रूप में नहीं देखना चाहते हैं. इस सन्दर्भ में रेलवे की पांचो फेडरेशनो ने दिनेश त्रिवेदी को रेलमंत्री बनाए रखने और उनके द्वारा की गई रेल किरायों में वृद्धि का समर्थन करते हुए प्रधानमंत्री को संयुक्त ज्ञापन भी दिया है. ममता बनर्जी लगातार केंद्र सरकार को ब्लैकमेल करती आ रही हैं. इस बार उन्होंने इसकी हद पार कर दी है. उन्होंने दिनेश त्रिवेदी को हटाकर मुकुल राय को रेलमंत्री बनाए जाने की एक चिट्ठी भी प्रधानमंत्री को भेजी है. 

इस बार प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेतृत्व को अपने सदविवेक, अगर थोड़ा-बहुत बचा हो तो, का परिचय देते हुए ठीक वैसा ही निर्णय लेना चाहिए, जैसा उन्होंने करीब चार साल पहले भारत - अमेरिका परमाणु समझौते पर शक्ति परीक्षण के समय वामपंथी पार्टियों की बाबत लिया था. पिछले लगभग तीन वर्षों से ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार के प्रति जैसा रवैया अपना रखा है, उसे देखते हुए, और कांग्रेस नेतृत्व में अगर थोड़ा भी आत्म-सम्मान बाकी है तो, उनकी पार्टी को अब एक दिन के लिए भी केंद्र सरकार के हिस्से के रूप में बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए. केंद्र की सत्ता में भागीदार होते हुए भी राष्टपति के अभिभाषण पर संशोधन प्रस्ताव लाकर और रेल बजट पेश करने के तुरंत बाद ही रेलमंत्री को हटा देने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाकर ममता बनर्जी ने देश की समूची लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ अत्यंत घिनौना मजाक किया है. ममता बनर्जी की तुनकमिजाजी और घटिया राजनीति तथा ऊल-जलूल दलीलों को देखते हुए अब यह भी साफ दिखने लगा है कि उनके नेतृत्व में खुद पश्चिम बंगाल की लुटिया भी जल्दी ही डूब जाने वाली है. 

ममता बनर्जी ने घटिया तर्क दिया है कि रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी ने रेल बजट प्रस्तुत करने से पहले उस पर पार्टी की राय नहीं ली थी. परंपरा के मुताबिक रेलमंत्री और वित्तमंत्री अपना - अपना बजट बनाने से पहले जिससे चाहें उससे फीडबैक ले सकते हैं, और वह लेते भी रहे हैं. इस बार भी यह राय उन्होंने सभी तबकों से ली है. इस बार रेलमंत्री ने तो इसके लिए सभी प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों से खुद वहां जा-जाकर उनकी राय लेने में भी कोई परहेज नहीं दिखाया. नियम के मुताबिक एक बार बजट बना लेने के बाद उसमें मौजूद तथ्यों का खुलासा संसद के अलावा अन्य किसी के सामने नहीं किया जा सकता. ममता बनर्जी खुद दो बार रेलमंत्री रह चुकी हैं. इतनी साधारण मगर बुनियादी बात का उनको कोई ज्ञान न हो, ऐसा नहीं हो सकता. उनका कहना है कि दिनेश त्रिवेदी ने पार्टी की विचारधारा के खिलाफ जाकर गरीब तबके के रेलयात्रियों का किराया भी बढ़ा दिया. उन्हें गरीब रेलयात्रियों की तो बड़ी चिंता है, मगर उन्होंने पश्चिम बंगाल में जो पिछले एक वर्ष से लागू करके बिजली की दरें बढाई हैं, उससे पश्चिम बंगाल के गरीबों की चिंता उन्हें नहीं है? यह उनका कैसा दोमुंहापन है? 

तुनकमिजाज और घटिया राजनीति की मिसाल बन चुकी ममता बनर्जी की समझ में यह सीधी सी बात क्यों नहीं आती है कि रेलवे हो या अन्य कोई सरकारी उद्यम, अगर वह खुद अपना खर्च नहीं निकलता है और अगर उसकी भरपाई सरकारी खजाने से करनी पड़ती है, तो इसका सर्वाधिक बोझ मुद्रा-स्फीति के रूप में पलट कर सबसे ज्यादा उस गरीब तबके के ऊपर ही पड़ता है. जिनमें से कुछ लोग तो शायद कभी रेल में पाँव भी नहीं रखते होंगे और जिनकी खैर-ख्वाही की झंडा-बरदारी ममता बनर्जी कर रही हैं. ममता बनर्जी की ऐसी घटिया और दिवालिया समझ, जिसके मुताबिक सरकार का काम किसी सस्ती लोकप्रियता के पीछे घिसटते रहने के सिवाय और कुछ भी नहीं है, सरकार तो क्या एक मामूली सी परचून की दूकान चलाने के लिए भी सर्वथा अक्षम है. 

हमें यह मान लेने से अब कोई गुरेज नहीं करना चाहिए कि यहाँ सत्ता में भागीदारी की राजनीति अब सीधे 'गवर्नेंस' के साथ टकराव पर उतारू हो गई है. कोई भी सरकार इस तरह तो नहीं चल सकती है, और न ही काम कर सकती है कि उसके सारे विभाग अपने - अपने मंत्रियों के आलाकमान का हुक्म मानते हुए अलग-अलग दिशाओं में चलें. अगर ऐसी नौबत आ जाए, जो कि ममता बनर्जी की तुनकमिजाजी और ब्लैकमेल की घटिया राजनीति के चलते आ ही गई है, तो या तो विरोधी विचारधाराओं को (ममता बनर्जी को) बाहर का रास्ता दिखा दिया जाना चाहिए, अथवा अपनी थुक्का-फजीहत कराने के बजाय सरकार को ही अपनी गरिमा को बचाए रखने के लिए सत्ता से विदा होने का कड़वा फैसला कर लेना चाहिए. इस परिप्रेक्ष्य में अब यह पूरा देश प्रधानमंत्री और यूपीए नेतृत्व, दोनों से उपरोक्त दोनों में से किसी एक निर्णय पर जल्दी से जल्दी पहुँचने की अपेक्षा करता है. 
प्रस्तुति : सुरेश त्रिपाठी 
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Thursday, March 15, 2012

National Seminar on
"RESURRECTION OF INDIAN RAILWAYS - AN INTROSPECTION

Dear Patron, 

It is a matter of great pleasure and pride to inform you that 'Paripurna Railway Samachar' is now in the 15th year of its publication after earning huge appreciation from ever expanding readership for its accurate and unsparing coverage of contemporary issues and concerns pertaining to stake holders of Indian Railways. Valuable comments from readers and other official quarters indicated creation of awareness and interest, that often resulted in fruitful investigation as well as redressal of problems and grievances. 

Each issue of 'Paripurna Railway Samachar' helped in highlighting the shortcomings inherent in the system. 'Paripurna Railway Samachar' has in fact, become synonymous with Railway ethos and culture. Encouraged by the enthusiasm shown by Railway personnel and general public in patronizing 'Paripurna Railway Samachar', steps have been taken to turn 'Paripurna Railway Samachar' into a National Railway fortnightly newspaper, so that the issues, topics and subjects which merit attention or redressal get taken up from all quarters and are not confined or limited to a privileged few. 

'Paripurna Railway Samachar' had organized seminars on various topics of prime importance. These seminars were attended by top brass of Railway Administration and were astounding success in terms of contents, messages, information and by the generous attendance of stakeholders at large. 

'Paripurna Railway Samachar' has now planned to organize another event to highlight the need for imbuing new life into this bulwark of India's future and economic growth so that Indian Railways may scale new heights like the bird of Phoenix. 

The focus of this National Seminar is on the "RESURRECTION OF INDIAN RAILWAYS - AN INTROSPECTION". The topic assumes significance in the present economic scenario in India and also brings relevance in the changing economic scenario across the globe. 


The Seminar will be held at 16.00 to 20.00 hrs on WEDNESDAY, 9th MAY 2012 at Yashwantrao Chavan Pratisthan Sabhagrih, Gen. J. N. Bhosale Marg, Near Mantralaya, Mumbai-400021. 

On this occasion a special issue of 'Railway Samachar' shall be brought out. Your views, thoughts, experiences and knowledge about Resurrecting this sleeping beauty, the Indian Railways and its relevance in making India a power to reckon with are earnestly solicited in the form of an ARTICLE/MESSAGE, along with your passport size photograph latest by 25th April 2012 for publishing in this issue, so that the same can be shared and appreciated by the valuable readers of 'Paripurna Railway Samachar'


Regards
Suresh Tripathi

Editor
Railway Samachar
Contact : 09869256875.
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Email : railwaysamachar@gmail.com

AN APPEAL TO THE PRIME MINISTER 
OF INDIA FROM "RAILWAY SAMACHAR"
Dated : 15 March 2012.
Respected Sir,
The "Paripurna Railway Samachar" a fortnightly newspaper, wholeheartedly support the rail fare hike announced yesterday in the Lok Sabha by Shri Dinesh Trivedi, Minister for Railways, in the Railway Budget for the year 2012-13. The increase is not only long overdue but also modest in its impact. The Railway Budget is also replete with agenda on Safety and Modernisation of the Railways, which will ultimately offer Safe, Secure and Smooth journey to over about two crore railway passengers per day of this country.
"Paripurna Railway Samachar" do not agree to any attempt to roll back the proposed fare hike as it will adversely impact not only Safety of Rail Travel, but also the financial stability and sustainability of the Railways. A roll back without matching subsidy from the General Exchequer will push the Indian Railways to the brink of collapse.
The media hype created against the budget is invented and baseless. Any sane thinking person who wants India to prosper will support the current railway budget as it addresses certain vital issues that go in the interest of nation building. Common man today do not clamor simply if his rupee vanishes from mobile phone and the Indian Media is doing that every day through gimmicks but no one is worried of that huge loss.  Each paise spent in buying a railway ticket brings a lot of value back to citizens.
Honourable Prime Minister of India should show the mettle to appreciate and implement the recommendations of railway budget. 
Regards
Suresh Tripathi
Editor
105, Doctor House,
Raheja Complex,
KALYAN(W)-421301.
Distt. - THANE, Maharashtra.
Mo. No. 09869256875.
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Tuesday, January 10, 2012


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A long awaited cherished dream of readers of 'Railway Samachar' come true...!

You have been always requesting for the English Edition of the most authentic National Newspaper on Indian Railways – "Railway Samachar"; and We at "Railway Samachar" honour your ardent demand from this new year 2012.

Read "Railway Samachar" with the most authentic news on all Zonal Railways and Production Units. Read what men who matters do and what they speak; check whether words confirm to deeds…! Read the most typical and nostalgic ‘Babugiri’ where Bureaucrats, their Kinsmen and Henchmen twist the unique and never meeting parallel lines of rail bend and meet to confirm their petty little motives…!

Honest, un-compromising, genuine to the core as it has been all these year yet one change... 

It is in English…!

Read "Railway Samachar" from 1st January 2012 onwards on internet...
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Sunday, January 1, 2012


सारे आरोप बेबुनियाद हैं -हिंद एनर्जी 

'रेलवे समाचार' की इस वेब साईट पर "हिंद एनर्जी और विमला लाजिस्टिक्स को ट्रैफिक अधिकारियों का संरक्षण" तथा दि. 1 से 15 दिसंबर 2011 के प्रिंट एडीशन में "क्यों पाला जा रहा है हिंद एनर्जी और विमला इन्फ्रास्ट्रक्चर को?" शीर्षक से प्रकाशित खबर पर 'हिंद एनर्जी एंड कोल बेनिफिकेशन (इंडिया) लि.' ने 'रेलवे समाचार' को एक क़ानूनी नोटिस भेजकर उपरोक्त खबर में प्रकाशित तथ्यों अथवा आरोपों को बेबुनियाद बताया है. कंपनी का कहना है कि रेलवे/ट्रैफिक अफसरों द्वारा कंपनी को नियमों के विपरीत करोड़ों का लाभ पहुँचाने, कोयले की लोडिंग/अनलोडिंग और ब्रोकरेज में कंपनी के इन्वाल्व होने, गैर-क़ानूनी तरीके से बिना आवश्यक और उचित अनुमति लिए कंपनी द्वारा रेलवे साइडिंग से कोयले की लोडिंग करने, करीब 700 करोड़ रु. की लागत से कंपनी द्वारा कोल वासरी लगाए जाने, अधिक दर पर कंपनी द्वारा सरकारी पावर हाउसों को धुले हुए कोयले की आपूर्ति करने और कंपनी में झारखण्ड के एक पूर्व मुख्यमंत्री का निवेश होने आदि जैसे तथ्य और आरोप एकदम मनगढ़ंत और बेबुनियाद हैं. 

कंपनी ने अपनी इस नोटिस में यह भी स्पष्ट किया है कि उसकी एक कोल वासरी है, जिसमे कंपनी द्वारा अपने ग्राहकों की जरूरत के मुताबिक उनके लिए सामान्य एवं न्यूनतम दरों पर कोयले की धुलाई की जाती है. पिछले वित्त वर्ष 2010-11 में कंपनी का कुल कारोबार 12 करोड़ रु. रहा है. नोटिस में कंपनी ने स्पष्ट किया है कि वह कोयले की ब्रोकरेज के धंधे में कभी-भी नहीं थी. कंपनी का कहना है कि लोडिंग/अनलोडिंग गतिविधियाँ कंपनी के लाजिस्टिक आपरेशंस का हिस्सा हैं. कंपनी का कहना है कि उसने रेलवे साइडिंग लाइन नंबर - 7, एक्सचेंज यार्ड, एनटीपीसी, गटोरा के इस्तेमाल हेतु दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे की कम्पीटेंट अथोरिटी से प्रायरिटी-डी के तहत कोयले की लोडिंग के लिए आवश्यक अनुमति (Letter No. C/SECR/BSP/SDG/COAL/CO-USER/6352, Dated 30.09.2010) ली हुई है. कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया है कि इसके अतिरिक्त उपरोक्त साइडिंग से अन्य कई फर्में/कम्पनियाँ भी इस प्रकार का कार्य कर रही हैं. कंपनी का कहना है कि उसके कोल वासरी प्लांट की कुल स्थापना लागत करीब 7.50 करोड़ रु. है. कंपनी का कहना है कि उसने किसी भी सरकारी पावर हाउस को गैर-क़ानूनी तरीके से धुले हुए कोयले की आपूर्ति (बिक्री) नहीं की है. कंपनी ने झारखण्ड के किसी भी पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा कंपनी में किसी भी प्रकार से एक भी पैसे का निवेश किए जाने से स्पष्ट इंकार किया है. कंपनी का कहना है कि उसके मालिकान एक अच्छी छवि वाले उद्योगपति हैं. इसलिए उपरोक्त शीर्षक से मानहानिकारक खबर से उनकी छवि धूमिल हुई है. कंपनी का कहना है कि उपरोक्त शीर्षक खबर में प्रकाशित तथ्य अत्यंत भ्रामक और दिग्भ्रमित करने वाले हैं, जिन्हें जानबूझकर उसकी छवि धूमिल करने के उद्देश्य से प्रकाशित कराया गया है. कंपनी का कहना है कि वह कभी-भी 'दलाली' के बिजनेस में नहीं थी. अतः उसके लिए 'दलाल' शब्द का प्रयोग किया जाना अत्यंत मानहानिकारक और आपत्तिजनक है. 

'रेलवे समाचार' का स्पष्टीकरण : इस सम्बन्ध में सर्वप्रथम हमारा कहना यह है कि उपरोक्त शीर्षक से प्रकाशित पूरी खबर कंपनी के खिलाफ नहीं, बल्कि रेलवे अफसरों के खिलाफ है. क्योंकि इस मामले में रेलवे के सम्बंधित अफसरों द्वारा रेलवे के स्थापित नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है. अब यदि रेलवे अफसरों द्वारा किए जा रहे नियमों के उल्लंघन के बारे में कोई खबर प्रकाशित की गई है, तो उनके इस उल्लंघन से लाभ पाने वाली कंपनी पर इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है. इसलिए यह समझना या कहना उचित नहीं है कि उक्त खबर कंपनी के खिलाफ है. इसके अलावा हमारा कहना यह भी है कि जिस समय द. पू. म. रे. द्वारा कंपनी को एनटीपीसी की सरकारी साइडिंग के इस्तेमाल करने की को-यूजर परमीशन (दि.30.09.2010) दी गई थी, वह पूरी तरह नियमों के खिलाफ थी, क्योंकि उस समय से और पूरे चार महीने पहले से रेलवे की प्राइवेट फ्रेट टर्मिनल (पीएफटी) (Railway Board's Letter No. 2008/TC(FM)/14/2, Dated 31.05.2010, Freight Marketing Circular No. 14 of 2010) पॉलिसी मौजूद थी. इस पॉलिसी के अनुसार किसी सरकारी या गैर-सरकारी साइडिंग को किसी तीसरी पार्टी के इस्तेमाल हेतु को-यूजर परमीशन तब तक नहीं दी जा सकती है, जब तक कि वे अपनी साइडिंग को पीएफटी में कन्वर्ट नहीं कर लेते हैं. इस संदर्भित सर्कुलर के अनुसार कंपनी (हिंद एनर्जी) अथवा एनटीपीसी को दी गई को-यूजर परमीशन अवैध और नियमों के खिलाफ है. अतः क़ानूनी नोटिस देकर और बिलासपुर प्रवास के दौरान संपादक को गुंडों द्वारा घेरकर और पुलिस कार्रवाई की धमकी देकर खबर का स्रोत बताने का दबाव बनाए जाने जैसी निम्न स्तरीय गतिविधियाँ किसी बड़ी और स्थापित कंपनी को शोभा नहीं देती हैं. तथापि उपरोक्त खबर से यदि कंपनी की छवि धूमिल हुई है, अथवा यदि उसकी गरिमा को ठेस पहुंची है और यदि उसकी किसी प्रकार की मानहानि हुई है, तो इसके लिए हमें अत्यंत खेद है.                                                                                                                                                                                                                                                   -संपादक 
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Here is a good news that Railway Samachar's ENGLISH Website also lanched on 1st January 2012..


Now all my beloved readers from Southern India can also read Railway Samachar in English on...


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सरकारी साइडिंग से निजी कंपनियों को 
अवैध रूप से दी जा रही है लोडिंग अनुमति  
बिलासपुर : कुछ कंपनियों को सरकारी (एनटीपीसी) साइडिंग से लोडिंग और कुछ कंपनियों को सरकारी (रेलवे) जमीन पर साइडिंग बनाने की अनुमति देकर कुछ ट्रैफिक अधिकारियों द्वारा इन निजी क्षेत्र की कंपनियों को संरक्षण प्रदान किया जा रहा है. यही नहीं, इन कंपनियों को करोड़ों रुपये का लाभ पहुंचाकर इनमे या तो इन अधिकारियों द्वारा हिस्सेदारी की जा रही है, या फिर इनसे अपनी 'हिस्सेदारी' वसूल की जा रही है. ज्ञातव्य है कि इन ट्रैफिक अधिकारियों ने सैकड़ों करोड़ के सालाना टर्नओवर वाले कुछ ऐसे कार्पोरेट घराने खड़े कर दिए हैं, जो कल तक रेलवे की साइडिंग या गुड्स शेडों में लोडिंग/अनलोडिंग कांट्रेक्टर हुआ करते थे अथवा दो-चार रेक की लोडिंग किया करते थे. अब यही लोग बड़ी कंपनियों के मालिक बनकर उन ट्रैफिक अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के बाद अपनी कंपनियों में नौकरी पर रख रहे हैं, जिन्होंने रेलवे की नौकरी में रहते हुए इन्हें पर्याप्त लाभ पहुँचाया था तथा ये पूर्व ट्रैफिक अधिकारी इन निजी कंपनियों के नौकर होकर अब अपनी पुराणी जगहों पर पदस्थ अपने जूनियर्स की मदद से न सिर्फ निजी कंपनियों को भरी फायदा पहुंचा रहे हैं, बल्कि अपने जूनियर्स को भी दबाव में लेकर भ्रष्ट बना रहे हैं.

प्राप्त जानकारी के अनुसार कुछ कंपनियों की अपनी कोई साइडिंग नहीं है. परन्तु रेलवे बोर्ड और जोन तथा मंडलों के कुछ ट्रैफिक अधिकारियों की मेहरबानी से इस कंपनी को बिलासपुर के पास स्थित एनटीपीसी की सरकारी साइडिंग से कोयला लोडिंग की अनुमति मिली हुई है. जो कि गैर-क़ानूनी है. बताया जाता है कि एनटीपीसी की इस साइडिंग से इन कंपनियों द्वारा प्रतिमाह सैकड़ों रेक कोयले की लोडिंग की जाती है. विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि रेलवे बोर्ड और जोन के ट्रैफिक अधिकारियों द्वारा एनटीपीसी को अपनी साइडिंग से अन्य कंपनियों को लोडिंग करने देने के लिए 'को-यूजर' परमीशन दी जाती है, जो कि पीएफटी पॉलिसी आने के बाद पूरी तरह गैर-क़ानूनी है. क्योंकि एनटीपीसी की निजी साइडिंग को पीएफटी में कन्वर्ट करने के बाद ही इससे अन्य कंपनियों को लोडिंग की छूट दी जा सकती है. सूत्रों का कहना है कि यह गोरखधंधा वास्तव में काफी समय से नीचे से ऊपर तक की मिलीभगत से चल रहा है. सूत्रों के अनुसार निजी कंपनियों द्वारा एनटीपीसी की साइडिंग से लोडिंग करने के लिए प्रति रेक लाखों रु. की राशि जोन और रेलवे बोर्ड के ट्रैफिक अधिकारियों को पहुंचाई जाती है..? 

रेलवे की जमीन पर साइडिंग बनाकर मालामाल हुई कंपनी 
प्राप्त जानकारी के अनुसार एक कंपनी ने कुछ ट्रैफिक अधिकारियों की मिलीभगत से रायपुर के पास सिलियरी में और रायगढ़ के पास भूपदेवपुर में रेलवे की जमीन पर अपनी दो साइडिंग बनाकर इन बीते पांच सालों में ही अपनी ग्रोथ को कई गुना बढ़ाया है. बताते हैं कि सिलियरी साइडिंग से इस कंपनी द्वारा प्रतिमाह 35 से 40 रेक और भूपदेवपुर साइडिंग से प्रतिमाह 55 से 60 रेक की लोडिंग की जाती है. सूत्रों के अनुसार रेलवे की जमीन पर निजी पार्टियों/कंपनियों को अपनी निजी साइडिंग बनाने की अनुमति नहीं है. इस कंपनी द्वारा रेलवे की जमीन पर बनाई गई उक्त दोनों साइडिंग पूरी तरह गैर-क़ानूनी है. यहाँ इस मामले में रेलवे के ट्रैफिक विशेषज्ञों की राय ज्यों की त्यों प्रस्तुत है..

As per Railways Policy, the private sidings were allowed to be developed by end-users. These private sidings were meant to be used by the end user himself who has constructed the siding. But if Railways permission was taken, the siding could be used by third parties also. This arrangement was called as ‘co-user’; in which the siding owner and user had to apply to the railways to allow certain specific party as ‘co-user’. Railways used to examine this request on case to case basis for every third party and used to allow the ‘co-user’ status for a specified period or regret it as the case may be.

For construction of private siding, the intending party MUST be an end user, ie. Either an industry or mine owner, etc., who intends to use the same for his own business. 

Before construction of private siding, party has to obtain RTC (Rail Transport Clearance) from Railway Board. This RTC was granted/rejected by the Railway Board after examining the likely traffic to be dealt in the proposed siding by the end user. The intending party had to provide the full detail of its production plans, the likely inward and outward traffic along with the originating and destination stations for the same. Here again the RTC could be granted to the end user only. 

Referenced companies are not an end users. Thus they neither should have been issued RTC nor should have been allowed to construct the private siding. 

It is most unfortunate that the party who should not have been allowed to construct private siding even on private land had been allowed to construct the same on railway land flouting all rules and regulations. 

Further, after the issue of the PFT Policy (FM Circular No. 14 of 2010) as amended, all the private sidings handling third party cargo MUST convert to PFT. Thus on date there cannot be a private siding handling ‘third party cargo’ unless it has been converted into a PFT. 
But in case of above refered companies, this conversion into PFT is not possible as PFT can only be on private land and a particular company is functioning on Railway land. 
This continuance of that particular company is totally illegal. 

Note: Last two paragraphs apply to NTPC, Sipat also. As on date their siding cannot be used by ‘third-party’ as ‘co-user’. Unless the siding of NTPC is converted into PFT its use by third party is illegal. 

उपरोक्त स्पष्टीकरण से यह एकदम स्पष्ट है कि न सिर्फ उक्त कंपनी की रेलवे की जमीन पर बनाई गई उपरोक्त दोनों साइडिंग अवैध और गैर-क़ानूनी हैं बल्कि निजी कंपनियों को एनटीपीसी की साइडिंग से रेल अधिकारियों द्वारा दी जा रही लोडिंग सहूलियत भी अवैध एवं गैर-क़ानूनी है. सूत्रों का कहना है कि इन सारी सहूलियतों को ख़त्म कर देना रेलवे बोर्ड और जोन के ही अधिकार में है, मगर यहाँ यह जानकर घोर आश्चर्य होगा कि इन अवैध गतिविधियों को बंद कराने की अपेक्षा रेलवे की जमीन पर अवैध एवं गैर-क़ानूनी रूप से दो साइडिंग बना लेने वाली कंपनी को और चार साइडिंग बनाने की अनुमति जोन के दायरे में दे दी गई है, जिनका निर्माण काफी जोरशोर से चल रहा है. यही नहीं, इसकी मांग पर इसे बढाकर प्रतिमाह 100 रेक लोड करने की अनुमति भी दे दी गई है, जो कि काफी लम्बे अरसे से पेंडिंग थी.. 

चूँकि रेलवे के कई कार्यरत और सेवानिवृत्त ट्रैफिक अधिकारियों का पैसा उपरोक्त प्रकार की तमाम कंपनियों में लगा हुआ है, और चूँकि कई अन्य अथवा जूनियर ट्रैफिक अधिकारियों को इनसे भरपूर लाभ मिल रहा है, तथा कई सेवानिवृत्त ट्रैफिक अधिकारी इन कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं, इसलिए इन कंपनियों का कारोबार दिन दुनी-रात चौगुनी तरक्की कर रहा है और सबको समान रूप से उसका वाजिब हिस्सा भी मिल रहा है. प्राप्त जानकारी के अनुसार विमला लाजिस्टिक के एक डायरेक्टर श्री एम. के. मिश्रा, रेलवे बोर्ड में एडीशनल मेम्बर/कमर्शियल रहे हैं. इसी प्रकार केएसके एनर्जी में कंसल्टेंट की नौकरी जीएम/द.म.रे. रहे श्री एम. एस. जयंत कर रहे हैं. जबकि बिजुरी और अनूपपुर की साइडिंग से कोयले की लोडिंग करने वाली माँ शारदा इंटरप्राइजेज के कंसल्टेंट पूर्व सीसीएम/द.पू.म.रे. श्री राधाचरण हैं. अब अगर इतने तथ्यों के बाद भी रेलवे बोर्ड को अक्ल नहीं आती है, तो इन पर अन्य जाँच एजेंसियों को ध्यान देना चाहिए. 
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